Sunday, September 1, 2019

व्यर्थ की चिंता नही करना चाहिए।(moral story in hindi)

          भगवान पर हमेशा विश्वास करना चाहिये


एक नगर में  बहुत ही पहुंचे हुए संत थे| आस-पास के कई गावों में संत के अनुयायी रहते थे| उन्हीं अनुयाइयों में संत का एक प्रिय शिष्य था सचितानंद| सचितानंद स्वाभाव से बहुत ही सीधा साधा भोला और साधारण व्यक्ति थे| सचितानंद हमेशा भगवान् की भक्ति में डूबा रहते थे| संत हमेशा सचितानंद को आश्रम आने और भक्तों को सही मार्ग दिखाने के लिए कहते लेकिन सचितानंद हमेशा घर परिवार का बहाना  बनाकर  टाल देते थे|

सचितानंद हमेशा कहाँ करते थे, मेरे बिना मेरी स्त्री और पुत्र नहीं रह सकते! मेरे अलावा उनका कोई सहारा नहीं है| मेरे बिना उनका भरण-पोषण कैसे होगा|

संत हमेशा सचितानंद को समझाया करते की यह सब तुम्हारा भ्रम है, जैसा तुम सोचते हो वैसा बिलकुल भी नहीं है, अगर भगवान् ने किसी को जन्म दिया है तो उसके जीवन यापन  के लिए भी उसने कुछ न कुछ वयवस्था ज़रूर किये है| तुम व्यर्थ की चिंता मत करो|

एक दिन जब सचितानंद संत के पास सत्संग के लिए गया तो संत ने फिर सचितानंद को वही फिर बात समझाई और कहा की अगर तुम्हें देखना है तो तुम परीक्षा करके देख सकते हो| सचितानंद मान गये|


संत ने सचितानंद को प्राणायाम के द्वारा साँस रोकने की विद्या सिखा दी| कुछ दिनों बाद जब सचितानंद परिवार के साथ नदी में नहाने गये तो वह साँस रोककर नदी के दूसरी और निकलकर जंगल में छुप गये और संत के आश्रम पहुँच गये|
इधर सचितानंद के परिवार वालों ने सचितानंद को बहुत ढूंढा लेकिन सचितानंद नदी में कहीं नहीं मिले| सचितानंद के परिवार वालों ने यह सोचकर की सचितानंद नदी में डूबकर कहीं दूर बह गये होंगे|


पुरे गाँव में शोक की लहर दौड़ पड़ी| सचितानंद को जानने-पहचानने वालों का सचितानंद के घर ताँता लग गया| संत के सभी अनुयायी भी सचितानंद के घर गए| अनुयाइयों ने देखा की सचितानंद तो बिचारा मर गये और पीछे उनकी स्त्री और बच्चा रह गए है| अब इनके भरण पोषण की ज़िम्मेदारी हम सभी के है , आपस मे विचार किये।

बस फिर क्या था सबने अपनी-अपनी तरफ से सहायता देना शुरू कर दी| किसी ने आटे की ज़िम्मेदारी ली, किसी ने दाल की ज़िम्मेदारी ली, किसी ने चावल की व्यवस्था करने की ज़िम्मेदारी ली| धीरे-धीरे सारी व्यवस्था हो गई|


संत के अनुयाइयों ने गाँव की ही एक धर्मशाला में कमरा लेकर सदानंद  की स्त्री और उसके पुत्र की जरुरत की सारी चीजे रखवा दी| साथ ही दूध और बाकि खर्चों के लिए उसके महीने का खर्चा बांध दिया| इस तरह संत की अनुयाइयों ने बिना संत के कुछ कहे ही सदानंद  के परिवार के लिए सारी व्यवस्था कर दी।

कुछ दिनों बाद सचितानंद  की स्त्री संत के दर्शन हेतु आश्रम आई| संत ने सचितानंद की स्त्री से पुछा, “तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं है ?

सचितानंद की स्त्री ने हाथ जोड़ते हुए विनम्रतापूर्वक जवाब दिया, महाराज! जो व्यक्ति चला गया उसकी पूर्ति तो नहीं की जा सकती, लेकिन हमारा जीवन निर्वहन पहले से भी अच्छा हो रहा है|

संत ने आश्चर्य से पूछा, पहले से भी अच्छा कैसे ?
सचितानंद की स्त्री ने आदर पूर्वक जवाब देते हुए कहा, महाराज! आपके अनुयाइयों ने ज़रूरत की सभी चीजे पहले ही धर्मशाला में रखवा दी है और मेरे जरुरी खर्चों के लिए भी रुपये बांध दी है| अब जब भी जिस भी वास्तु की जरुरत होती है सब मिल जाता है|

इधर सचितानंद आश्रम के अन्दर बैठा साथ और उसकी स्त्री की सारी बातें सुन रहा था| सचितानंद की स्त्री के जाने के बाद संत ने सचितानंद से कहा की तू अब अपने घर जाकर देखो की जो तुम्हारी स्त्री ने कहा क्या वह सत्य है या फिर नहीं|
सचितानंद रात के समय अपने घर गया और बाहर से ही दरवाजा खटखटाया| सचितानंद की स्त्री ने अन्दर से ही पूछा, कौन है ?

सचितानंद बोला, में हूँ…तुम्हारा पति, दरवाजा खोलो। सचितानंद की आवाज सुनकर सचितानंद की स्त्री ने सोचा की सचितानंद की तो मृत्यु हो चुकी है| यह जरुर सचितानंद का भुत होगा|

सचितानंद की स्त्री बोली, नहीं! में दरवाजा नहीं खोलती
सचितानंद बोला, मैं मरा नहीं हूँ… तुम दरवाजा खोलो।
सचितानंद की स्त्री बोली, बच्चे अगर तुम्हें देखेंगे तो डर के मारे उनके प्राण निकल जाएँगे| इसलिए कृपा करके आप चले जाओ|


सचितानंद बोला, लेकिन मेरे बिना तुम्हारा काम कैसे चलेगा ?
स्त्री बोली, संत के अनुयाइयों की कृपा से पहले से भी बढ़िया काम चल रहा है| आप चिंता मत करो! बस आप कृपा करके यहाँ से चले जाओ|


सचितानंद बोला, तुम्हें कोई दुःख तो नहीं ?
स्त्री बोली,  अभी तो बस यही दुःख है की आप आ गए| बस आप न ऐ तो फिर कोई दुःख नहीं| कृपा करके आप मत आइये|

शिक्षा :-

व्यर्थ की चिंता नही करि चाहिए इंसान चिंता कर कर के अनेक रोग बीमारी को बुलावा देता है। भगवान जिस भी जीव को जन्म दिए है उनका भरण- पोषण के लिए कोई न कोई वयवस्था जरूर किये रहते है। अतः हमें भगवान पर हमेशा विश्वास करना चाहिये।

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